शिक्षा के अधिकार की ए, बी, सी.

भारतीय संविधान भारतीय लोकतंत्र का आधार है. इस संविधान में नागरिक अधिकारों को लेकर बड़ी स्पष्ट संरचना है और इन्हीं अधिकारों में शिक्षा का अधिकार भी शामिल है.

किसी भी राष्ट्र के निर्माण में बच्चों का अपना विशिष्ट स्थान रहता है और इसके साथ यह बात भी पूर्णतः सत्य है कि बच्चे ही देश के कर्णधार होते हैं.

कल्पना करना मुश्किल नहीं है कि अगर बच्चों को उचित शिक्षा नहीं मिलती है तो राष्ट्र का गर्त में जाना एक तरह से तय हो जाता है. वैसे भी भारत शिक्षा के मामले में विकसित देशों से बहुत पिछड़ा हुआ है. 2007 के संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि 66% के एक गरीब साक्षरता दर वाले राष्ट्र के रूप में भारत गिना जाता है. संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की एक अन्य रिपोर्ट में जो 2009 में आई थी, उसमें विश्व साक्षरता रैंकिंग में भारत का 149 वां स्थान था. जाहिर तौर पर इसमें काफी कुछ किए जाने की आवश्यकता है.

ऐसी स्थिति में संविधान में शिक्षा का अधिकार अनुच्छेद 21क के तहत राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत मान्यता प्राप्त है. इसमें स्पष्ट कहा गया है कि स्टेट अपनी इकोनॉमिक कैपेबिलिटी और विकास की सीमाओं के भीतर शिक्षा और बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी और विकलांगता के मामले में सार्वजनिक सहायता करने के लिए काम करता है. इसी के तहत प्रभावी व्यवस्था निर्मित की जाती है.

इसी क्रम में संविधान का 86वां संशोधन अधिनियम 2002 में पारित हुआ. इसके अनुसार, 6 से 14 वर्ष के आयु के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देना मौलिक अधिकार के रूप में चिन्हित किया गया है.

इसका मतलब साफ है कि 6 से 14 साल के बच्चों को किसी हालत में राज्य मुफ़्त शिक्षा प्रदान करेगा. निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिनियम 2009 में बच्चों के अधिकार जो अनुच्छेद 21क के तहत मौजूद है, उसमें मैंडेटरी स्टैंडर्ड्स को पूरा करने की बात कही गई है. इसके तहत गुणवत्तापूर्ण और पूर्णकालिक प्रारंभिक शिक्षा को बच्चों का अधिकार माना गया है. अनुच्छेद 21क और आरटीई (Right to Education) अधिनियम 1 अप्रैल 2010 को लागू हुआ. इसमें निशुल्क और अनिवार्य शब्द सम्मिलित किया गया. यह अधिनियम निम्नलिखित बातों को प्रतिपादित करता है:

बच्चों के रहने के स्थान से किसी पड़ोस के स्कूल में प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने तक निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा बच्चों का अधिकार है.
यह अधिनियम यह भी स्पष्ट करता है कि किसी स्कूल में 6 से 14 साल के बच्चे का अनिवार्य प्रवेश एवं विद्यालय में उसकी उपस्थिति सरकार को बाध्य करता है. इसमें आनुपातिक रूप से शिक्षकों की तैनाती का प्रावधान करने की भी बात कही गई है, जिनके पास पढ़ाने की आवश्यक योग्यता हो.

इस अधिनियम में शारीरिक दंड, मानसिक उत्पीड़न, शुल्क, अध्यापकों द्वारा निजी ट्यूशन और बिना मान्यता के स्कूलों को चलाना मना किया गया है. साथ ही इसमें संविधान के अनुरूप सिलेबस चलाने का प्रावधान भी है जो बच्चे का समग्र विकास, बच्चे का ज्ञान और उसकी प्रतिभा निखारने को सुनिश्चित करने की बात करता है.

शिक्षा के अधिकार को लेकर कई चुनौतियां भी सामने आयी हैं, जिनमें बहुतायत स्कूलों का इस कानून के तहत सारे मानकों को पूरा नहीं करना है. लाखों बच्चे अब भी स्कूलों से बाहर ही हैं. इसके अलावा बेहद पिछड़े इलाकों में स्कूलों का बंद होना भी एक बड़ी समस्या के रूप में चिन्हित किया गया है. गरीब बच्चों के एडमिशन के नाम पर निजी स्कूलों में अब भी कई खेल चल रहे हैं, जिन्हें रोकने की आवश्यकता है.
पर इन सब चुनौतियों के बावजूद हालत में निश्चित तौर पर सुधार दिखा है, इस बात में दो राय नहीं.

जाहिर तौर पर भारतीय संविधान में प्रदत्त यह अधिकार भारत के भविष्य के लिए बेहद आवश्यक और मजबूत अधिकार है. हालांकि इसका क्रियान्वयन किस हद तक संभव हो सका है, यह समय-समय पर परीक्षण करते रहने की बात है. पर निश्चित रूप से शिक्षा की गुणवत्ता में परिवर्तन आया है और भविष्य में आएगा, इस बात में दो राय नहीं है.

शिक्षा के अधिकार से संबंधित आपकी क्या राय है. कमेंट बॉक्स में बताएं.